कर्म, पुनर्जन्म और भगवान की कृपा भाग एक 

 जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म और कर्म इत्यादि का महान विद्वानों और गुरुजानो ने समय समय पर बहुत अच्छा ज्ञान प्रस्तुत किया है।  कई धर्मों में पुनर्जन्म की परिकल्पना ही नहीं है।  अतः वर्त्तमान समय में इसकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है।  

किन्तु जब कोई भी व्यक्ति हताश होकर, अथवा आस-पास या अपने साथ हो रहे अन्याय को लेकर क्रोधित होता है तो उसके पास इसका दो या तीन से अधिक कारण नहीं होते है; ज़्यादातर लोग कहते हैं कि दुनिया ही बुरी है, या लोग ही ख़राब हैं।  कुछ लोग कहते हैं कि समय ठीक नहीं है, इसलिए ऐसा हो रहा है।  पर जो लोग ईश्वर में अटूट आस्था रखते हैं तथा समर्पित होकर कर्म करते हैं, वे ऐसी दुविधा में नहीं रहते।  वे कर्म और कर्मफल को समझते भी हैं और सहर्ष स्वीकार करते है।  

अब प्रश्न यह है कि कर्म क्या है? इसका सीधा सा उत्तर है कि जो भी हम करते हैं अथवा नहीं करते वह सब कर्म है।  इसका फल भी हम भोगते हैं, कुछ का तुरंत और कुछ का बाद में, धीरे-धीर।  मान लीजिये कि किसी बच्चे ने एक दिन गृहकार्य (होमवर्क) नहीं किया, उसका कर्मफल उसे तुरंत अगले दिन गुरूजी द्वारा सजा के रूप में मिल जाएगा।  

अगर वह सुधर जाता है तो उसका कर्म भी आगे से ठीक हो जाता है।  पर अगर वह बालक वही राह पकडे रहे, या गुरूजी को भ्रमित करता रहे कर पढाई से जी चुराना चालू रखे, अथवा स्कूल जाना ही छोड़ दे तो विद्या से उसका नाता टूट गया।  साधारणतयः वो नौकरी या शिक्षा से सम्बंधित कार्यों  के लिए भविष्य में अयोग्य हो जाएग।  यह उसका कर्मफल है।  

अब अगर वह बालक कोई ऐसी चीज़ में दक्षता हासिल कर लेता है, जो उसे आगे काम आएगी जैसे कोई खेल या कोई भी हुनर अथवा व्यापार, तो उसने अपना कर्म सुधर लिया।  

यह बात यहाँ इसलिए बताई गयी है ताकि जो बंधु यह सोचते हैं कि कर्म एक सीधी रेखा है और एक बार बिगड़ गया तो सत्यानाश होकर रहेगा, वे इस मतिभ्रम में न पड़ें।  


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